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और अब हमारे पास इंडोनेशिया के फौज़ान से इंडोनेशियाई भाषा में एक हार्टलाइन है, जिसमें कई भाषाओं में उपशीर्षक हैं:साल 2001 में, मैं एक आईटी विशेषज्ञ था और मेरी पत्नी कंप्यूटर शिक्षा केंद्र में काम करती थीं। एक दिन उन्हें गुरुवर की पुस्तक ‘तत्काल आत्मज्ञान की कुंजी’ की एक कॉपी मिली। उक्त पुस्तक पढ़ने के बाद उन्होंने वीगन बनने और क्वान यिन ध्यान का अभ्यास करने की अनुमति माँगी। मैंने सख्त मना कर दिया, क्योंकि मेरा मानना था कि वीगन आहार अस्वास्थ्यकर है। फिर भी मेरी पत्नी अडिग रही। उन्होंने मुझे समझाया कि यह वह आध्यात्मिक मार्ग है जिसकी वह जीवनभर खोज करती रही थी। इस पर मनन करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि जिसे वह सच्चे मन से अपनी पुकार मानती हैं, उसके मार्ग में बाधा डालने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। मैंने एक शर्त पर उनका समर्थन किया कि वह मुझसे भी वीगन बनने या उसी मार्ग का अनुसरण करने को नहीं कहेंगी।कुछ दिनों बाद मैं बीमार हो गया और घर पर ही रहा। अकेले आराम करते समय मैंने देखा कि मेरी पत्नी ‘तत्काल आत्मज्ञान की कुंजी’ किताब अपनी ड्रेसिंग टेबल पर ही छोड़ गई थीं। जिज्ञासावश मैंने इसे पढ़ना शुरू किया। कुछ ही पन्ने पढ़ने के बाद, किसी चीज ने मुझे भीतर गहराई से छुआ। उस पुस्तक ने मुझे जीवन और अध्यात्म के बारे में ऐसी गहरी समझ प्रदान की, जिसे मैं पहले कभी नहीं जानता था। मंत्रमुग्ध होकर मैंने लगभग पूरा दिन पढ़ते हुए बिताया। उस रात मैंने आकाश से एक उल्कापिंड गिरने का सपना देखा। अगली रात, यह सपना जारी रहा। उल्कापिंड मेरे घर के पास गिरा और विस्फोट हुआ, जिससे विशाल सुनहरा-श्वेत प्रकाश निकला। तीसरी रात, सपना फिर जारी रहा। जैसे ही प्रकाश मंद हो गया, मैंने इसके भीतर मास्टर को खड़े देखा। मास्टर मेरी ओर आए, मेरे बिस्तर के पास बैठे और प्रेम और करुणा के साथ उन्होंने धीरे से मेरा माथा छुआ। फिर गुरुवर ने कहा, “मानव हृदय बहुत कठोर होता है, समुद्र तट की चट्टानों से भी कठोर। इतना कठोर कि परमेश्वर उसकी आँखों के सामने खड़े हों, तब भी वह विश्वास करने से इनकार करता है।” ये शब्द सुनते ही अनियंत्रित होकर मेरे चेहरे पर आँसू बहने लगे। जब मैं जागा, तब भी मेरा चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।अगली सुबह मैंने मेरी पत्नी से कहा, “आज से मैं वीगन बनूँगा और मैं गुरुवर की शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहता हूँ।” वह चकित रह गई, क्योंकि वह जानती थी कि पहले मैंने इसका कितना सख्त विरोध किया था। उस दिन से हमने एक साथ साधना किया। 12 अक्टूबर 2002 को हम दोनों ने दीक्षा प्राप्त की। पीछे मुड़कर देखने पर एहसास हुआ कि मुझे यह मार्ग मिलने से पहले ही गुरुवर ने मेरी ओर हाथ बढ़ाया था। कभी-कभी हमें लगता है कि हम मार्ग खोज रहे हैं, लेकिन सही समय आने पर मार्ग स्वयं हमें खोज लेता है। इंडोनेशिया से फौज़ानजागृत फौज़ान, अपने सकारात्मक रूपांतरण की अद्भुत कहानी साझा करने के लिए धन्यवाद। कठोर मानव हृदय तक पहुँचने की गुरुवर की शक्ति सच में अद्भुत है। उनका अथाह प्रेम ब्रह्मांड के सबसे अंधकारमय स्थानों में भी प्रवेश कर सकता है। हमारी दयनीय पृथ्वी के लिए परमेश्वर की करुणा का माध्यम बनने हेतु हम उनके सदा आभारी हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति और अथक प्रयासों के बिना हम सब अब तक नष्ट हो चुके होते। आपकी बात बिल्कुल सत्य है: जब हम तैयार होते हैं, मार्ग हमें खोज लेता है; यह सब दिव्य कृपा है, हमारे प्रयास नहीं। परमेश्वर तक अपना मार्ग पाने के लिए हमें समर्पण करना होगा। कामना है कि आप और इंडोनेशिया के सहृदय लोगों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रेम में शांति मिले, सुप्रीम मास्टर टीवी टीम











